3 हड़ताली डॉक्टरों को 3 दिन हिरासत में रखा, सरकार को देना होगा ~9 लाख मुआवजा


राज्य मानवाधिकार आयाेग ने दिसंबर 2017 में डाॅक्टराें की हड़ताल के दाैरान भरतपुर के तीन डाॅक्टराें की गिरफ्तारी को गैरकानूनी मानते हुए एक-एक लाख रुपए प्रतिदिन के हिसाब से मुआवजा देने के सरकार को आदेश जारी किए हैं।

आयाेग ने सरकार काे तीनों डाॅक्टराें को तीन-तीन लाख रुपए मुआवजा देने काे कहा है। मानवाधिकार आयाेग के अध्यक्ष प्रकाश टाटिया ने इस मामले में एडीएम भरतपुर शहर के खिलाफ टिप्पणी करते हुए यहां तक कहा है कि बगैर मस्तिष्क का उपयाेग करते हुए उन्हाेंने डाॅक्टराें काे न्यायिक अभिरक्षा में भेजा था।

दरअसल दिसंबर 2017 में डाॅक्टराें ने विभिन्न मांगाें काे लेकर प्रदेशभर में हड़ताल की थी। इस दाैरान कई डॉक्टरों को गिरफ्तार किया गया, इनमें तीन भरतपुर के डाॅ. कप्तान सिंह, डाॅ. मनीष गाेयल और डाॅ. मुकेश कुमार वशिष्ठ भी शामिल थे। गिरफ्तार किए डॉक्टरों को पुलिस ने एडीएम भरतपुर शहर के सामने पेश किया। इस पर एडीएम ने जमानत-मुचलकाें के लिए तीनों से एक-एक करोड़ रुपए मांगे। इसके बाद तीनों को पुलिस हिरासत में भेज दिया गया।

अतिरिक्त जिला मजिस्ट्रेट पर टिप्पणी करते हुए पूछा कि पुलिस ने कैसे मान लिया कि रात 12 बजे सरकारी डाॅक्टर खुद के घर पर बैठकर शांतिभंग कर रहा है। दिन हाेने का इंतजार क्याें नहीं किया। सभी सरकारी चिकित्सक हैं और लाेकसेवक हैं। इनके फरार हाेने का अंदेशा नहीं था तब उन्हें सामान्य जमानत मुचलके के बजाय एक कराेड़ रुपए की जमानत पेश करने का आदेश बिना दिमाग का उपयाेग किए गए व बगैर जांच पारित आदेश है। इन शर्ताें काे पूरा किए जाना संभव ही नहीं था। आयोग ने अपने आदेश में कहा है कि यह बात साबित करती है कि एडीएम इन्हें जेल में ही रखना चाहते थे।

आयोग की 6 बड़ी टिप्पणियां, जो आईना दिखाती हैं

  • 1. एडीएम शहर के खिलाफ की टिप्पणियाें के आधार पर कार्यपालक मजिस्ट्रेट पर तत्काल विभागीय कार्रवाई करेंं, ताकि भविष्य में प्रशासन या सरकार से ऊपर कानून काे मान्यता देने का संदेश मजिस्ट्रेट तक पहुंच सके।
  • 2. इस केस में कानून का भी बहुत दुरुपयाेग किया गया है और मानव अधिकाराें का हनन किया गया है। इन डाॅक्टर्स के खिलाफ गैर कानूनी रूप से आईपीसी की धारा 107, 116, 3 व 151 लगाई गई, जो गलत है।
  • 3.राज्य सरकार ऐसे मानव अधिकाराें के हनन काे जारी रखना चाहती है और विशेष बात यह है कि ऐसे मानव अधिकाराें के हनन क्याें जारी रहने चाहिए। इस संबंध में एक भी तर्क राज्य सरकार के पास नहीं है।
  • 4. इन व्यक्तियाें के खिलाफ काेई भी आपराधिक रिकाॅर्ड प्रस्तुत नहीं हाे रहा है। ये काेई हिस्ट्रीशीटर, आतंकी या डकैत ताे नहीं, सरकारी डाॅ. जैसे जिम्मेदार पद पर हैं। ऐसे में बिना विधि प्रक्रिया की पालना ऐसे आदेश उचित नहीं।
  • 5. भरतपुर के अतिरिक्त जिला मजिस्ट्रेट द्वारा पारित आक्षेपित आदेश विधि और तथ्यों के अनुकूल नहीं है। इस्तगासा पेश करने की कार्रवाई और पारित आक्षेपित आदेश, दाेनों ही विधिक प्रावधानों के बिलकुल वितरीत हंै।
  • 6. राज्य सरकार मानव अधिकारों का हनन और समर्थन कर रही है। यह अत्यंत खेदजनक है। मानव अधिकाराें का हनन हाेते रहने की पूरी अनुमति राज्य सरकार द्वारा जारी रखने का निर्णय लिया जाना और भी ज्यादा कष्टप्रद है।

ऐसे समझें पूरा मामला

  • हड़ताल के दाैरान डाॅ कप्तान सिंह सहित कई डाॅक्टराें काे 15 दिसंबर 2017 काे करीब रात 12 बजे गिरफ्तार किया गया था।
  • 16 दिसंबर काे इन डॉक्टरों को भरतपुर एडीएम शहर के समक्ष पेश किया गया।
  • जमानत के लिए कप्तान सिंह काे सात जमानती पेश करने के लिए कहा गया। इनमें 2 सरकारी कर्मचारी द्वारा 50 हजार रुपए का मुचलका पेश करने और पांच जमानती 20-20 लाख रुपए के प्रस्तुत करने के लिए कहा गया। ऐसी जमानत नहीं मिलने पर जेल भेजने का निर्णय लिया गया।
  • भरतपुर के सत्र न्यायालय ने एक लाख रुपए की जमानत पर डाॅ. कप्तान सिंह काे 18 दिसंबर 2017 काे रिहा करने के आदेश दिए थे।
  • इसी तरह के मामले में डाॅ. मनीष गाेयल और डॉ. मुकेश कुमार वशिष्ठ के भी थे।
  • भरतपुर के सत्र न्यायालय में एडीएम शहर के निर्णय के खिलाफ याचिका लगी। सत्र न्यायालय ने एडीएम के आदेश 31 मई 2018 काे खत्म कर दिया था।
  • डाॅ. कप्तान सिंह ने राष्ट्रीय मानव अधिकार आयाेग में शिकायत दर्ज कराई थी, जिससे 12 फरवरी 2018 काे ये मामला राज्य मानव अधिकार अायाेग में पहुंचा।
  • अब राज्य मानवाधिकार आयोग ने इन डॉक्टरों को 3-3 लाख रु. मुआवजा देने का आदेश जारी किया।