कुंवारी लड़कियां अच्छे वर और घर की कामना के लिए मनाती हैं ये पर्व


 मध्यप्रदेश के मालवा – निमाड़ सहित आदिवासी बाहुल्य जिलों में श्राद्ध पक्ष की शुरुआत के साथ ही लोकोत्सव संजा पर्व की भी शुरुआत हो गई। प्रदेश के झाबुआ, अलीराजपुर, धार, बड़वानी, खरगोन, खंडवा और रतलाम आदि क्षेत्रों में इस पर्व की इन दिनों खासी धूम है। मान्यताओं के अनुसार संजा बाई का पर्व माता पार्वती के ससुराल से अपने मायके आने पर सहेलियों के साथ रहने और खेलने – कूदने के तौर पर मनाया जाता है।

कुंवारी लड़कियां अच्छे वर और घर की कामना के साथ ये पर्व मनाती हैं। पर्व के दौरान लड़कियां गांवों में घर के आंगन में दीवार पर गोबर से सोलह दिनों तक विभिन्न आकृतियां गढ़ते हुए मांडने बनाती हैं। इन आकृतियों को रंगबिरंगे फूलों से सजाया जाता है। शाम के वक्त सहेलियां एकत्रित होकर संजा बाई के गीत गाती हैं।

सोलहवें दिन सर्वपितृ अमास्या को संजा बाई को नगर के नदी या तालाब में विसर्जित कर दिया जाता है। हालांकि इस ठेठ देशी त्योहार में भी अब समय के साथ आधुनिक तरीके अपनाए जाने लगे हैं। गांवों में अब गोबर के स्थान पर बाजारों में कागज पर रचे मांडनों का उपयोग होने लगा है, जिन्हें युवतियां दीवारों पर चिपका लेती हैं।