दादा लाेकाे पायलट थे, 27 साल बाद आद्या बनीं जोधपुर मंडल की पहली महिला ट्रेन गार्ड


जोधपुर. पटरी मरम्मत करने से लेकर ट्रेन के इंजन में बैठकर उसे चलाने के लिए पाथ देने वाले स्टेशन मास्टर जैसे पद पर जोधपुर में महिलाओं की तैनाती हो चुकी है। लेकिन ट्रेन में बतौर गार्ड कोई महिला नियुक्त नहीं हुई। जोधपुर सिटी स्टेशन से शनिवार सुबह जब आद्या चतुर्वेदी हाथ में लाल व हरी झंडी लेकर अहमदाबाद पैसेंजर में चढ़ीं तो वे इस मंडल की पहली महिला गार्ड बन गईं।

उनके दादा द्वारकानाथ भी रेलवे में थे। वे 1992 में लोको पायलट पद से सेवानिवृत्त हुए थे। तब वे गार्ड के झंडी दिखाने पर ट्रेन को आगे बढ़ाते थे और अब 27 साल बाद उनकी पोती गार्ड बनकर रेलवे में पहुंची है। मूलत: कोटा की रहने वाली आद्या ने बताया कि रेल भर्ती बोर्ड की परीक्षा देने के बाद वह प्रतीक्षा सूची में रह गई थी। हालांकि बाद में उनका नंबर आ गया। उदयपुर में बतौर रेलवे गार्ड की पढ़ाई के साथ प्रशिक्षण भी लिया। गत 20 जून को ट्रेनिंग पूरी होने के बाद जोधपुर मंडल में नियुक्ति मिली।

आद्या ने बताया कि यह जॉब कठिन जरूर है, लेकिन अब तो रेलवे में हर काम महिलाएं कर रही हैं। बतौर ट्रेन गार्ड के रूप में काफी जिम्मेदारी रहती है। यह ट्रेन के पहले फेरे से एहसास हुआ। पहली बार इस जिम्मेदारी को निभा रही थी तो थोड़ी घबराहट भी थी, लेकिन धीरे-धीरे यह घबराहट भी अनुभव में बदल जाएगी। आद्या के पिता रमेश चतुर्वेदी प्रॉपर्टी का काम करते हैं तो मां क्षमा गृहिणी हैं। दादा द्वारकानाथ रेलवे में ही काम करते थे, वे लोको पायलट पद से सेवानिवृत्त हुए थे।