यहां राधा नहीं, मीरा के कृष्ण; गिरधर की वही प्रतिमा जिसे भक्त शिरोमणि ने पूजा


आज जन्माष्टमी है। बधाई। जयपुर के आराध्य श्रीराधा-गोविंददेवज मंदिर में चार-पांच लाख लोगों का मेला जुटेगा। उधर, आमेर में मीरा के गिरधर पूजे जाएंगे। गिरधर की प्रतिमा, जिसे भक्त शिरोमणि मीरा ने पूजा था। प्रेम में मीरा ने अमर भजन रच दिए और अंत में मीरा इसी प्रतिमा में समा गईं थीं। आमेर के जगत शिरोमणि मंदिर में मीरा के इसी गिरधर के आज जन्म दर्शन होंगे।

मेवाड़ की मीरा की यह प्रतिमा चित्तौड़ से महाराजा मानसिंह (प्रथम) हल्दी घाटी युद्ध (जून 1576) के बाद आमेर ले आए थे। मंदिर महंत गोपाल लाल शर्मा ने धार्मिक दस्तावेज के आधार पर यह तथ्य बताया। मानसिंह की रानी कर्णावती ने अपने पुत्र जगत सिंह की याद में जगत शिरोमणि मंदिर बनवाया। पुरातत्व विभाग के अनुसार मन्दिर 1599 ईस्वी से 1608 ईस्वी के दक्षिण भारतीय शैली में यह मंदिर बनवाया गया।

400 साल पहले यह मूर्ति चित्तौड़ से लाए थे महाराजा मानसिंह
मीरा बाई मेवाड़ में 600 वर्ष पूर्व भगवान श्रीकृष्ण की जिस मूर्ति को पूजा करती थी इस मंदिर में श्रीकृष्ण की वही प्रतिमा है। हल्दी घाटी के युद्ध के बाद मानसिंह प्रथम इस प्रतिमा काे चित्तौड़गढ़ से लेकर आमेर अाए थे। आमेर में जिस मंदिर में प्रतिमा की स्थापना की गई वह मंदिर विष्णु भगवान का जगतशिरोमणि मंदिर है। मंदिर में श्रीकृष्ण की प्रतिमा के साथ भक्त के रूप में मीरा बाई की
प्रतिमा भी रखी गई। -जगतशिरोमणि मंदिर के महंत गाेपाल लाल शर्मा ने दैनिक भास्कर को बताया
शिल्प

15 फीट ऊंचे चबूतरे पर संगमरमर से बनाया मंदिर। पीले पत्थर, सफेद और काले संगमरमर से बने मंदिर में पौराणिक कथाओं के आधार पर गढ़ा शिल्प दर्शनीय है। इस मन्दिर में उंचाई पर हाथी, घोड़े और पुराणों के दृश्यों का कलात्मक चित्रांकन है। इस मंदिर का मंडप दो मंजिल का है। यह मंदिर हिंदु-वैष्णव संप्रदाय से संबंधित है। मंदिर के तोरण, द्वार-शाखाओं, स्तंभों आदि पर बारीक कारीगरी है। उस समय इस मंदिर के निर्माण में 11 लाख रु.खर्च हुए थे।

मंदिर का नामकरण

रानी कर्णावती की इच्छा थी कि इस मंदिर के द्वारा उनके पुत्र जगत सिंह को सदियों तक याद रखा जाए। मंदिर वैश्विक पहचान बनाए। इसलिए उन्होंने इसका नाम जगत शिरोमणि रखा, यानी भगवान विष्णु के मस्तक का गहना। यह मंदिर स्थापत्य कला का अनूठा उदाहरण है।