हुकमनामा श्री हरिमंदिर साहिब जी 19 मई



अंतरि मैलु जे तीरथ नावै तिसु बैकुंठ न जानां ॥ लोक पतीणे कछू न होवै नाही रामु अयाना ॥१॥ पूजहु रामु एकु ही देवा ॥ साचा नावणु गुर की सेवा ॥१॥ रहाउ ॥ जल कै मजनि जे गति होवै नित नित मेंडुक नावहि ॥ जैसे मेंडुक तैसे ओइ नर फिरि फिरि जोनी आवहि ॥२॥ मनहु कठोरु मरै बानारसि नरकु न बांचिआ जाई ॥ हरि का संतु मरै हाड़्मबै त सगली सैन तराई ॥३॥ दिनसु न रैनि बेदु नही सासत्र तहा बसै निरंकारा ॥ कहि कबीर नर तिसहि धिआवहु बावरिआ संसारा ॥४॥४॥३७॥

अर्थ :-अगर मन में विकारों की मैल (भी टिकी रहे, और) कोई मनुख तीरर्थों पर नहाता फिरे, तो इस तरह उस ने स्वर्ग में नहीं जा पहुँचना; (तीरर्थों पर नहाने से लोक तो कहने लग जाएँगे कि यह भक्त है, पर) लोकों के संतुष्ट होने से कोई लाभ नहीं होता, क्योंकि परमात्मा (जो हरेक के दिल की जानता है) अंजाना नहीं है।1। गुरु के बताए मार्ग पर चलना ही असल (तीर्थ-) स्नान है। सो, एक परमात्मा देव का भजन करो।1।रहाउ। पानी में डुबकी लगाने से अगर मुक्ति मिल सकती हो तो मेंढक सदा ही नहाते हैं। जैसे वह मेंढक हैं उसी प्रकार वह मनुख समझो; (पर नाम के बिना वह) सदा योनियों में पड़े रहते हैं।2।

अगर मनुख काँशी में शरीर त्यागे, पर मन से रहे कठोर, इस तरह उस का नरक (में पड़ना) छुट नहीं सकता। (दूसरी तरफ) परमात्मा का भक्त मगहर की श्रापी हुई धरती में भी अगर जा मरे, तो वह बिल्क और सारे लोकों को भी तार लेता है।3। कबीर कहते है-हे मनुखो ! हे कमले लोको !

उस परमात्मा को ही सिमरो। वह वहाँ बसता है जहाँ दिन और रात नहीं, जहाँ वेद नहीं, जहाँ शासत्र नहीं (भावार्थ, वह भगवान उस आत्मिक अवस्था में पहुचने से मिलता है, जो आत्मिक अवस्था किसी खास समे की मोहताज़ नहीं, जो किसी खास धर्म-पुस्तक की मोहताज़ नहीं) source : dainik savera