राजसमंद के जगदीश ने पैरा रिले टीम के साथ 11 घंटे 46 मिनट में पार किया कैटलीना चैनल


राजसमंद के केलवा के दिव्यांग तैराक जगदीश तेली ने 6 सदस्यीय रिले टीम के साथ साेमवार काे कैलिफाेर्निया में 11 घंटे 46 मिनट में कैटलीना चैनल पार कर लिया। जगदीश की टीम एशिया की पहली दिव्यांग रिले टीम बन गई जिसने यह कारनामा किया है।

इससे पहले जगदीश की टीम ने पिछले वर्ष 24 जून 2018 इंग्लिश चैनल पार किया था। इसी के साथ बैक-टू-बैक इंग्लिश और कैटलीना चैनल पार करने वाली जगदीश की यह विश्व की पहली पैरा रिले टीम भी बन गई है। जगदीश के साथ उनकी टीम में महाराष्ट्र के चेतन गिरधर राउत, मध्यप्रदेश के सतेन्द्र सिंह, पश्चिम बंगाल के रिमो साह, महाराष्ट्र की गीतांजलि चौधरी और छत्तीसगढ़ की अंजनी पटेल शामिल थी। टीम के साथ काेच राेहन माेरे थे।

यह रिकाॅर्ड बनाए जगदीश ने

  • इंडिया का ऐसा पहला तैराक जिन्हाेंने 7 दिन में तीन बार कैटलीना चैनल पार किया। दाे सामान्य लाेगाें की रिले और एक पैरालिम्पिक इंडियन टीम के साथ पार किया।
  • इंडियन पैरा रिले टीम एशिया की पहली पैरा टीम बनी जिसने कैटलीना चैनल पार किया है।
  • विश्व की पहली टीम जिसने इंग्लिश चैनल के बाद कैटलीना चैनल बैक टू बैक पार किया।
  • राज्य का एकमात्र पैरा तैराक जिसने कैटलीना-इंग्लिश चैनल पार किए हैं।

जगदीश की कहानी, उन्हीं की जुबानी

बंधन से रात में तैराकी शुरू करने की अनुमति मिली थी और रात 10.57 बजे टीम के लिए सेंटा कैटलीना आइलैंड से मैंने तैरना शुरू किया। यह पहला राउंड था। पानी में उतरने के बाद घुप्प अंधेरा था, कुछ भी नहीं दिख रहा था। साथ में चलती बाेट से सायरन बजा, वहीं से शुरुआत की। पानी में उतरते ही अजीब लगा, बेहद ठंडा पानी। कुछ देर तैरने के दौरान बड़ी-बड़ी लहरें टकराने लगी और समंदर का पानी निगलने में आने लगा।

जितनी भी बार ऐसा हुआ, मितली जैसा महसूस होता और ऐसा लगने लगता कि बाहर निकल जाऊ। सांस लेने के लिए मुंह ऊपर करने पर भी पानी मुंह में चला जाता। मगर एक घंटा बिना रुके तैरना भी बेहद जरूरी था। एक सेकंड भी रुकता ताे टीम के लिए दिक्कत हाेती। साथ में जाे बाेट चल रही थी, उसे फाॅलाे कर रहा था। बाेट पर ग्लाे स्टिक की मदद से अंधेरे में तैराकी हाेती है। लहर आने पर ऐसा लगता मानो बाेट अपने ऊपर आ गिरेगी। हर पल मन में एक डर ताे बना ही रहता है।

पानी में उतरने से पहले कंधाें के नीचे वैसलीन लगानी पड़ती है। मैं लगाना भूल गया था, ताे उस जगह छाले पड़ गए थे। डॉल्फिन और सील मछलियां भी साथ तैर रही थीं। फिर सुबह करीब 5 बजे दूसरा राउंड शुरू किया। तैयार हाेकर पानी में कूदा ताे ठंडे पानी का झटका लगा। आधे घंटे बाद ही उजाला हाेने लगा था। प्राेत्साहित करने वाले दाेस्त और बाेट दिखने लगते, जिससे सफर थाेड़ा आसान हाेता रहा।

-जैसा कि जगदीश ने कैलिफॉर्निया से भास्कर को बताया।

72 मेडल जीत चुके

जगदीश अब तक 52 नेशनल मेडल सहित 72 मेडल जीत चुके हैं। जगदीश के पिता खमान खेती करते हैं और मां नारायणी घर संभालती हैं। दाे भाई उनसे छाेटे हैं। जगदीश ने बताया कि उन्हें इंग्लिश चैनल अाैर कैटलीना चैनल के लिए कई सामाजिक संस्थाअाें, संगठनाें ने मदद की। बता दें कि जगदीश काे बचपन में पाेलियाे हाे गया था। अासपास इलाज कराया, मगर असर नहीं हुअा। इसके बाद एक पैर खराब हाे गया। हालांकि अब जगदीश बताते हैं कि तैराकी ने उनके पैर काे काफी सही कर दिया है। पहले वाे सपाेर्ट लेकर चलते थे, मगर अब बिना सपाेर्ट के ही चल पाते हैं।

उदयपुर में किराए के पैसे नहीं थे, राजसमंद झील पार कर आए थे सबकी नजर में

32 साल के जगदीश ने साल 2007 में राजसमंद झील पार की थी। इसी के बाद वे लाेगाें की नजर में आए। प्रशिक्षक महेश पालीवाल और तैराक भक्ति शर्मा की मां और प्रशिक्षक लीना शर्मा ने उदयपुर बुलवाकर ट्रेनिंग दी। 2008 में जब वे उदयपुर आए थे, तब उनके पास रहने का किराया देने जितने पैसे भी नहीं थे। जीतमल बाेराणा ने घर में रखा। ट्रेनिंग ही नहीं, लीना ने काॅस्टयूम भी दिलाया। फिर यूआईटी में एक्सईएन रहे मुकेश जानी ने लगभग सालभर अपने घर में रखा। फिर मुम्बई में 6 साल तैराकी सीखी। 2015 में खेलगांव पहुंचे।

साेचा नहीं था बेटा बड़ा नाम करेगा : पिता
जगदीश के पिता खमान बाेले कि उन्हाेंने कभी नहीं साेचा था कि जगदीश इतना बड़ा काम करेगा। खमान ने कहा कि जगदीश ने देश का, शहर, गांव और समाज का नाम राेशन किया है।

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