हर 12वें मिनट में आत्महत्या कर रही हमारी ‘मनीषा’, इसे हर हाल में बचाना होगा

बीकानेर। पहले जयपुर की रेजीडेंट डाक्टर साक्षी और अब बीकानेर के एसपी मेडिकल कॉलेज की इंटर्न डाक्टर मनीषा ने गले में फंदा डाल जिंदगी को अलिवदा कह दिया। ‘मनीषा’ शब्द के हिंदी में मोटे तौर पर दो अर्थ है। पहला-अक्ल, बुद्धि या इंटेलीजेंसी। दूसरा-इच्छा, अभिलाषा, कामना।

यहां प्रभुराम की बेटी मनीषा ने तो जान दी ही है आत्म्हत्याओं के आंकड़े बताते हैं कि हर दिन देश में 366 लोग आत्महत्या कर रहे हैं जिनमें 33 फीसदी यानी 122 लोग 18 से 30 की उम्र के हैं। मतलब यह कि हर 12वें मिनट में एक युवा जिंदगी के दबाव के आगे बेबस हो मौत को गले लगा रहा है। उस उम्र का युवा जिससे देश, समाज को उम्मीदें या अाकांक्षाएं होती हैं। जो आज के दौर में हमारी बौद्धिक क्षमता का प्रतीक भी हैं यानी हमारी मनीषा है। बात सिर्फ राजस्थान की ही की जाए तो विधानसभा में दिए गए एक जवाब के मुताबिक वर्ष 2008 से 2017 तक राजस्थान में 319 स्टूडेंट्स ने अात्महत्या कर ली। अधिकांश मौतों में कारण पढ़ाई का दबाव, फेल होने का डर रहा।

कइयों में दूसरे वैयक्तिक कारण भी शामिल रहे। नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो ऑफ इंडिया के पास देशभर में आत्महत्या के जो नवीनतम आंकड़े हैं वे वर्ष 2015 के ही हैं। इस रिपोर्ट के मुताबिक भी वर्ष 2015 में 18 से 30 वर्ष तक की उम्र के 43852 युवाओं ने खुद की जिंदगी खत्म कर ली। उस वर्ष आत्महत्या करने वाले कुल 1,33,623 लोगों में से इस उम्र के लोग सबसे ज्यादा 33 फीसदी हैं।

मेडिकल कॉलेज के डाक्टरों ने माना… हॉस्टल में रहने वाले ज्यादा मानसिक दबाव में 
बीकानेर में एसपी मेडिकल कॉलेज के मनोरोग विभाग ने वर्ष 2016 में 150 स्टूडेंट्स पर एक अध्ययन किया ‘कंपेरेटिव एनालिसिस ऑफ स्ट्रैस एंड डिप्रेशन अमंगग द स्टूडेंट्स प्रिपेरिंग फॉर कांपीटेटिव एग्जाम रिजाइनिंग एट हॉस्टल और होम।’ अध्ययन करने वाले डाक्टर के.एल.कच्छावा बताते हैं, इनमें से हॉस्टल में रहकर तैयारी करने वाले स्टूडेंट्स पर उनसे ज्यादा मानसिक दबाव देखा गया जो दिनभर कॉलेज-इंस्टीट्यूट में पढ़कर शाम को घर चले जाते हैं या डे-स्कालर हैं। बैक डिप्रेशन स्केल यानी बीडीएस बढ़ने की कई वजह हैं जिनमें अकेलापन, खाने-पीने के पुख्ता इंतजाम नहीं होना, साथ रहने वालों से प्रतिष्पर्द्धा या इर्ष्या, कार्यस्थल का माहौल अनुकूल नहीं होना आदि शामिल हैं।

अंतहीन दौड़ में शामिल न हों : डा. वर्मा 
सीकर के मेडिकल कॉलेज प्राचार्य एवं मनोरोग विभागाध्यक्ष डा.के.के.वर्मा कहते हैं, पहले 10वीं, फिर सीनियर सैकंडरी, नीट, एमबीबीएस, पीजी, सुपरस्पेशियलिटी तक की दौड़ कभी खत्म ही नहीं हो रही। इस दौड़ में कई बार जीवन के महत्वपूर्ण व्यक्तिगत सुख मिल नहीं पाते या छूट जाते हैं। पढ़ाई के साथ खेलने, परिवार के साथ समय बिताने, लिखने-सुनने, जैसी अपनी पसंद की चीजों में वक्त देना ही होगा अन्यथा भले ही मजबूत मनोबल के चलते अप्रिय कदम न उठाएं लेकिन मशीन बनकर रह जाएंगे।

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