राजस्थान: 27 दिन पहले फेंकी गई बच्ची को गोद लेना चाहता था दंपती, प्रक्रिया की जटिलता में मासूम नहीं बची


खबर बस इतनी है कि नागौर में लावारिस मिली बच्ची की जयपुर के जेके लोन अस्पताल में मौत हो गई है, खबर से बहुत आगे गंभीर मुद्दा यह है कि लावारिस बच्चों को गोद लेने की प्रक्रिया बहुत जटिल है…लोग चाहते हैं कि इन बच्चों को उनका नाम मिले मगर सरकारी फाइलों में इन्हें अननाॅन बेबी ही लिखा जाता है।

नागौर में 27 दिन पहले कूड़े के ढेर में मिली बच्ची को गोद लेने के इच्छुक रहे लेखक, पत्रकार व फिल्मकार विनोद कापड़ी को बच्ची नहीं मिल पाई। वे पत्नी साक्षी जोशी के साथ उसे मिलने नागौर भी गए और जयपुर भी आए। तमाम औपचारिकताएं पूरी कीं, मगर…कानूनी पेच के चलते बच्ची उन्हें नहीं मिली। कूड़े के ढेर से नागौर के अस्पताल, फिर जोधपुर के अस्पताल में बच्ची का इलाज चला, तबीयत बिगड़ती गई…जयपुर के जेके लोन अस्पताल आई तब तक उसकी हालत क्रिटिकल हो गई। …और सोमवार को बच्ची ने दम तोड़ दिया। कूड़े में मिली बेटी को गोद लेना चाहते थे विनोद कापड़ी, लेकिन कानून कायदे भावनाओं पर नहीं चलते, मां-बाप से   से बड़ा कानून क्यों, यही पीड़ा बता रहे हैं विनोद कापड़ी, पढ़िए…

गोद लेने के सख्त कानून का ही असर है कि पीहू का दो सप्ताह तक नागौर के छोटे से अस्पताल में इलाज चलता रहा, उसकी हालत बिगड़ती ही चली गई। ये भी गोद लेने का कानून का ही असर है कि उसे नागौर से जयपुर ना भेजकर जोधपुर भेजा गया और जोधपुर को भी 24 घंटे ही समझ आ गया कि हालात ठीक नहीं हैं। और ये भी गोद लेने का क़ानून का ही असर है कि जयपुर आते-आते वो इतनी बीमार हो गई कि आईसीयू के पलंग पर तरह-तरह के तारों में उलझ गई।

जो सर्जरी एक हफ्ते पहले हो जानी चाहिए थी, वो हुई ही नहीं। गोद लेने के इस कानून में पहले दिन से ही कोई इंसान क्यों नहीं जुड़ जाता जो बच्चे के बारे में फ़ैसले ले सके? वो भी इतने छोटे और गंभीर बीमार बच्चे? क्या कोई एक भी व्यक्ति, विभाग, एजेंसी बताएगी कि पीहू या इस जैसे बच्चे ऐसे हालात तक क्यों पहुंचते हैं कि वो सर्जरी के लायक भी नहीं रही? 

शनिवार शाम से ही सबकुछ ठीक नहीं था। जब मैं पहली बार जेके लोन मेडिकल सुपरिटेंडेंट डॉ. अशोक गुप्ता से मिला तो उन्होंने बताया कि सारी आंतें उलझ गई हैं। शरीर के जिस हिस्से से स्टूल पास होना चाहिए वहां से न होकर मुंह से हो रहा है। एंटी बाॅयोटिक्स काम नहीं कर रही हैं। सर्जरी ही होगी, जल्द से जल्द। रविवार को सर्जरी का वक्त तय हुआ। लेकिन पीहू के प्लेटलेट्स काउंट बहुत गिर गए। सर्जरी नहीं हो सकती। यानी, सर्जरी ही विकल्प था, वह भी नहीं हो पाई।

नागौर से जोधपुर और जोधपुर से जयपुर तक एक बात जो सबसे ज्यादा असहज और बेचैन कर रही थी…पीहू के नाम के आगे हर जगह अननाॅन बेबी लिखा गया। मैं अपना नाम देना चाहता हूं, मैंने दे भी दिया मगर सरकारी फाइलें खुद उसकी अभिभावक बनी रही। 

एक सवाल है मेरा सभी से-  कानून के मुताबिक जब तक बच्ची या बच्चे को परिवार नहीं मिल जाता, वो सरकार के संरक्षण के रहेगा/रहेगी। क्या कोई बता सकता है सरकार के प्रतिनिधि के तौर पर अस्पताल में या बच्ची के पास कोई एक इंसान कभी रहता है क्या? एक भी इंसान? बच्ची को गोद लेने के लिए मैंने और मेरी पत्नी ने अपनी तरफ से प्रक्रिया पूरी कर ली। हमें यह बच्ची मिल पाती तो शायद इसे इलाज जल्दी मिल जाता।

अपने बच्चे जैसी हर वक्त संभाल मिल पाती। 25 दिन का यह अनुभव जिंदगीभर का मलाल बन गया है। गोद लेने के कानून की जो प्रक्रिया है उसके मुताबिक इस बच्ची को कम से कम एक डेढ़ साल तक परिवार नहीं मिलने वाला था। मिल ही नहीं पाया। मैं किसी की भी मंशा और नीयत पर सवाल नहीं उठा रहा। सब अपनी तरफ से लगे हुए हैं। सवाल ये कि इस देरी और देरी से उपजे हालात का ज़िम्मेदार कौन है?

अगर लावारिस बच्चो को गोद लेने के कानून में कुछ कमियां हैं तो उन्हें सुधारा जाए। पहला सुधार तो तुरंत ये होना चाहिंए कि अगर किसी बच्चे को तुरंत अस्थायी अभिभावक मिल रहे हैं तो कानूनी लिखा पढ़ी करके बच्चे/बच्ची को तुरंत ऐसे अभिभावक को सौंप देना चाहिंए ..भले ही ये व्यवस्था अस्थायी क्यों ना हो। मेरा और मेरी पत्नी साक्षी का सरकार और कानूनविदों से सिर्फ एक सवाल है- एक नवजात को भी सरकार सिर्फ एक फ़ाइल क्यों मान लेती है कि जैसे फ़ाइल आगे बढ़ती रहती है, वैसे ही बच्चे भी बढ़ जाएंगे?