तीन युद्धों के भागीदार कल्याण सिंह जब भी बाॅर्डर से लाैटकर बहन से मिलते थे ताे वही दिन रक्षाबंधन

देश को आजादी लंबी लड़ाई, हजारों कुर्बानियों और तमाम जुल्मों-सितम के बाद मिली है। हिन्दुस्तान 15 अगस्त 1947 की आधी रात अंग्रेजों से मुक्त हो गया था। एक लंबे समय से गुलामी की बेड़ियों में जकड़े भारत को खुली हवा में सांस लेने का मौका मिला तो हर ओर बस जश्न का माहौल था।

मैं खुद को खुशकिस्मत समझता हूं कि मैंने आजादी की इस लड़ाई में अपना योगदान दिया। यह कहना है कि देश की आजादी के लिए तीन युद्ध लड़ने वाले 89 वर्षीय सैनिक कल्याण सिंह शेखावत का। स्वतंत्रता दिवस के मौके पर अपने अनुभवों को शेयर करते हुए उन्होंने बताया कि इस योगदान के लिए मुझे सैन्य सेवा मेडल, 1947 में जनरल सर्विस मेडल, 1965 में रक्षा मेडल से नवाजा जा चुका है।

सेलिब्रेशन :  बाॅर्डर से लाैटते ही 36 किमी पैदल चल बहन से जरूर मिलता
कल्याण सिंह बताते हैं कि जब भी ड्यूटी से घर आने का मौका मिलता, 36 किमी दूर नागौर बहन एजन कंवर से जरूर मिलने जाता था। लंबे टाइम बाद जब भी ड्यूटी से घर को लौटता था तो एजन के लिए कुछ न कुछ साथ लाता था। मिठाई खराब ना हो, इस वजह से घर लौटने के बाद अगली सुबह 4 बजे ही नागौर के लिए पैदल निकल जाया करता था। पांच भाई और एक बहन है, लेकिन सबसे ज्यादा लगाव बहन से रहा है। साल में 2-3 बार ड्यूटी से घर आना होता था, लेकिन जब भी हम एक-दूसरे से मिलते थे वो दिन राखी के त्योहार से कम भी नहीं हुआ करता था।

मेरी जंग: पुर्तगालियों के साथ लगातार 36 घंटे चला था युद्ध, भारत को मिली जीत
1961 के ऑपरेशन विजय को याद करते हुए कल्याण सिंह ने बताया कि ब्रिटिश और फ्रांस के सभी औपनिवेशिक अधिकारों के खत्म होने के बाद भी भारतीय उपमहाद्वीप गोवा, दमन और दीव में पुर्तगालियों का शासन था। भारत सरकार की बार-बार बातचीत की मांग को पुर्तगाली ठुकरा रहे थे, जिसके बाद भारत सरकार ने ऑपरेशन विजय के तहत सेना की छोटी टुकड़ी भेजी। 18 दिसंबर 1961 के दिन ऑपरेशन विजय की कार्रवाई की गई। भारतीय सैनिकों की टुकड़ी ने गोवा के बॉर्डर में प्रवेश किया। भारत और पुर्तगाल की सेनाओं के बीच लगभग 36 घंटे तक लगातार युद्ध चला। अंततः पुर्तगाली सेना ने भारतीय सेना के सामने घुटने टेक दिए।

साहस : हथियारों से नहीं, जवानों के साहस से जीता था 1965 का भारत-पाक युद्ध
कल्याण सिंह ने बताया कि 1965 के युद्ध की डोगराई की लड़ाई भी निर्णायक लड़ाइयों में से एक है। उस दौर में पाकिस्तान के पास बेहतर हथियार थे और अमेरिका ने पाक को 200 स्पेशल आर्मी टैंक भी दिए थे। इस वजह से पाक के पास टैंकों की संख्या भारत के मुकाबले ज्यादा हो गई थी तो पाक ने पूरे बॉर्डर को टैंकों से घेर लिया था। यही कारण रहा कि पाकिस्तान ने 70 प्रतिशत तक युद्ध टैंकों के दम पर लड़ा। लेकिन भारतीय जवानों ने भी हार नहीं मानी। हमारे जवान साहस दिखाते हुए पाकिस्तानी सीमा में प्रवेश करते हुए बाटानगर तक पहुंच गए थे। बाद में उस वक्त भारत की सरकार के कहने पर जवानों ने अपने कदम पीछे हटा लिए थे। लेकिन युद्ध विराम से पहले भारतीय सैनिकों ने कड़े संघर्ष के बाद डोगराई पर दोबारा कब्जा किया था। इसमें दोनों देशों के बहुत सारे सैनिक मारे गए थे।

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