कमबैक के बाद कैसा होगा रानी मुखर्जी का अंदाज



बॉलीवुड एक्ट्रेस रानी मुखर्जी की फिल्म हिचकी शुक्रवार को रिलीज हो गई है. तीन साल के लंबे ब्रेक के बाद रानी बॉलीवुड में कमबैक कर रहीं हैं. रानी ने इस फिल्म में एक ऐसी लड़की का किरदार निभाया है, जो ऐसी बीमारी से जूझ रही है, जिसे बात करने में काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है.

‘आपकी ये हिचकियां कब बंद होंगी?’ एक स्कूल में नौकरी मांगने आई नैना माथुर यानी रानी मुखर्जी से एक प्रिंसिपल ये सवाल करता है, जिसके जवाब में नैना बताती हैं कि उन्हें टूरेट सिंड्रोम है जो कि एक न्यूरोसाइकेट्रिक यानी दिमाग से जुड़ा डिसॉर्डर है. इसकी वजह से वो बोलते वक्त बीच में हिचकी जैसी आवाज निकालती हैं.

फिल्म ये मानकर चलती है कि हम सबको इस डिसॉर्डर के बारे में पता है और देखने वाले को नैना क्या और क्यों कर रही हैं, समझ में आ रहा है. लेकिन इसे थोड़ा बेहतर समझाया जा सकता था. ‘मैंने कभी किसी टीचर को नहीं देखा, जिसे स्पीच डिसॉर्डर हो’, इंटरव्यू ले रहे दूसरे शख्स ने नैना को दूसरी नौकरी ढ़ूंढ़ने की सलाह दी, लेकिन नैना ऐसे हर सवाल के मुंहतोड़ जवाब के साथ तैयार थी.

अंग्रेजी लेखक ब्रैड कोहेन की किताब, फ्रंट ऑफ द क्लास पर आधारित ये फिल्म स्कूलों में पिछड़े तबके से आए बच्चों को शामिल करने की कोशिश और समाज में आमतौर पर होने वाले भेदभाव के आस-पास घूमती है.

नैना के बहुत कोशिशों के बाद स्कूल उसे नौकरी दे देता है, लेकिन एक बड़ी चुनौती के साथ. उसे जिम्मेदारी दी जाती है क्लास 9F को पढ़ाने की, जहां राइट टू एजुकेशन के तहत पास की बस्ती के बच्चों को एडमिशन दिया गया है. फिल्म में निर्देशक सिद्धार्थ मल्होत्रा स्कूल लाइफ के कई दिल छू लेने वाले सीन्स और टीचर की जिम्मेदारियों पर भारी-भरकम डायलॉग से दर्शकों का मन तो जरूर जीत लेते है.

फिर भी फिल्म गहराई में नहीं जा पाती. शारिरिक या मानसिक असामनता फिल्म का केंद्र नहीं बना.

फिल्म में कई चीजें जरूरत से ज्यादा आसान कर दी गई हैं. जैसे क्लास 9A के बच्चे टॉपर और 9F के सबसे कमजोर और बीच के सेक्शन्स कहीं गायब. टीचर्स में भी इतना ही बड़ी फर्क दिखाया गया है. पूरी फिल्म में सिर्फ दो टीचर दिखते हैं, एक सख्त और दूसरी हमेशा मुस्कुराती हुई, जिसकी वजह से फिल्म का अंत सबको पहले ही पता होता है. हालांकि फिल्म में कुछ अच्छी चीजें भी है, जैसे नैना का बेहतरीन किरदार और उसकी रोज की समस्याओं से जूझने की ताकत. साथ ही क्लास के बच्चों का किरदार भी फिल्म में जान भर देता है.