रतन टाटा के चेयरमैन बनने का समर्थन करने वाले को ही रतन ने किया बर्खास्त !



सायरस मिस्त्री पर इल्ज़ाम लगा कि उन्होंने टाटा के मूल्यों का निर्वहन नहीं किया. लेकिन वे करते तो आने वाला समय शायद उन्हें माफ़ नहीं करता

आपने सोनी कंपनी का नाम ज़रूर सुना होगा. इसके संस्थापक अकिओ मोरिता की जीवनी पर एक शानदार किताब है ‘मेड इन जापान.’ क़िताब में एक बेहद दिलचस्प किस्से का ज़िक्र है. एक बार अकिओ मोरिता के पास उनके दोस्त और कंपनी में नंबर दो की पोजीशन रखने वाले मसारू इबूका आये. बोले कि पिछले कुछ दिनों से दोनों के बीच मतभेद काफ़ी बढ़ गए हैं, इसलिए किसी एक को अब कंपनी छोड़ देनी चाहिए. चूंकि अकिओ मोरिता कंपनी के संस्थापक थे लिहाज़ा इबूका ने अपने इस्तीफ़े की पेशकश की. मोरिता ने उस दिन जो इबूका को कहा वह कॉर्पोरेट जगत में एक सूक्ति की तरह याद किया जाता है. उन्होंने कहा कि वे दोनों अलग-अलग राय रखते हैं, इसलिए कंपनी को दोनों की ही ज़रूरत है. जिस दिन दोनों की सोच एक हो जायेगी, तब शायद एक ही आदमी की ज़रूरत रहेगी.

पिछले साल अक्टूबर में जब रतन टाटा ने टाटा समूह की कंपनियों के चेयरमैन साइरस मिस्त्री से अचानक इस्तीफ़ा मांग लिया तब उसके पीछे दिए गए कई कारणों में से एक था कि कई मुद्दों पर दोनों की राय अलग-अलग थी. नमक से लेकर सॉफ्टवेयर तक बनाने वाले टाटा समूह के 150 साल के गौरवशाली इतिहास में सायरस मिस्त्री छठे चेयरमैन थे और उनका कार्यकाल सबसे कम समय का था. वे सिर्फ 2012 से 2016 तक इस पद पर रहे. इसके पहले नौरोजी सकलटवाला छह साल तक चेयरमैन रहे थे. उनका अचानक देहांत हो गया था.

आख़िर क्या कारण थे कि टाटा समूह ने पहली बार अपने चेयरमैन को बर्खास्त कर दिया? आगे बढ़ने से पहले कुछेक अहम तथ्य जान लेते हैं जो काम आयेंगे.

टाटा समूह – कुल मिलाकर 100 से ऊपर कंपनियां है जो टाटा समूह में आती हैं. नवम्बर 2017 के आंकड़ों के हिसाब से समूह का कुल बाज़ार पूंजीकरण लगभग नौ लाख 35 हज़ार करोड़ रुपये है.

टाटा संस-1868 में स्थापित. टाटा परिवार के सदस्यों द्वारा संचालित और समाज सेवा के कार्यक्रमों में अग्रणी. टाटा संस के लगभग 80 फीसदी शेयर्स इसके तहत आनेवाले ट्रस्टों के पास हैं और इसके ज़रिये ही टाटा समूह की कंपनियों में निवेश किया जाता है. मिस्त्री परिवार के पास टाटा संस के लगभग 18.4 फीसदी शेयर्स हैं. सर रतन टाटा ट्रस्ट और सर दोराबजी टाटा ट्रस्ट इसके दो सबसे बड़े ट्रस्ट हैं. टाटा संस के चेयरमैन हैं रतन टाटा. चैरिटी कमीशन के तहत टाटा संस एक समाज सेवा के तौर पर रजिस्टर्ड है और यही बात पूरे किस्से में सबसे ज़्यादा महत्वपूर्ण है.

क्या कंपनी में दो शक्ति केंद्र हो गए थे?

1991 में जब रतन टाटा चेयरमैन बने थे तो टाटा संस के हालात कुछ अलग थे. समूह की कई कंपनियों में टाटा संस की भागीदारी बेहद कम थी. बल्कि टाटा की कई कंपनियों में टाटा संस से ज्यादा हिस्सेदारी बिरला समूह की कंपनी पिलानी इन्वेस्टमेंट्स की थी! पालून जी शापूर जी मिस्त्री टाटा समूह के सबसे बड़े शेयर धारक थे. टाटा समूह की अहम कंपनियों पर क्षत्रपों का अधिपत्य था. कई सारे शक्ति केंद्र थे. इन विकट हालात में रतन ने लगभग पांच साल तक संघर्ष किया और सिरमौर बनकर उभरे. समय का फेर देखिए कि जब उन्होंने कुर्सी छोड़ी तो 1991 वाले हालात हो गए. जाते-जाते उन्होंने समूह के चेयरमैन को टाटा संस के लिए जवाबदेह बनाकर उसकी ताक़त कुछ कम कर दी थी. इसका नतीजा यह हुआ कि समूह में दो केंद्र बनकर उभरे. एक, रतन टाटा का और दूसरा, साइरस मिस्त्री का.

सायरस मिस्त्री ने अपने बचाव में भी यही बात कही थी जिसे टाटा संस ने नकार दिया. हालांकि, जानकार मानते हैं कि दोनों पक्षों के शक्ति केंद्रों की वजह से समूह के संचालन में दिक्कतें आ गई थीं.

दोनों की राय कहां-कहां पर अलग थी?

बताते हैं कि सबसे पहले ओडिशा में हुए विधानसभा चुनाव को लेकर मतभेद हुआ. मिस्त्री और उनके सलाहकारों ने 2014 में वहां होने वाले चुनाव के लिए 10 करोड़ रुपये के चंदे का प्रस्ताव पेश किया था. जानकारों के मुताबिक इस बात पर रतन उनसे ख़फ़ा हो गए क्योंकि टाटा संस सिर्फ़ लोकसभा के चुनाव में चंदा देता है और वह भी किसी ट्रस्ट के ज़रिये. प्रस्ताव खारिज हो गया. दरार पड़ गयी.

सायरस मिस्त्री की तरफ के लोगों की मानें तो तय यह हुआ था कि विधानसभा चुनावों की फंडिंग वहां कार्यरत कंपनी का निर्णय है क्योंकि वह राज्य के हालात से वाकिफ़ है. ओड़िशा में टाटा समूह की लौह अयस्क की खानें हैं इसलिए यह राज्य उसके लिए काफ़ी अहम है.

मिस्त्री शायद टाटा समूह के इतिहास को याद कर रहे थे जिसे रतन टाटा भूलना चाहते थे. 1997 में टाटा टी पर असम में प्रतिबंधित संगठन उल्फ़ा को फंडिंग देने का आरोप लगा था. असम सरकार चाय के बागानों में काम करने वालों और कंपनियों के अधिकारियों को उल्फ़ा जैसे संगठनों से सुरक्षा दे नहीं पाती थी. इसलिए आरोप लगे कि कंपनी ने अपनी सुरक्षा उस संगठन से ख़रीद ली जिससे उसे सबसे ज़्यादा ख़तरा था. ओड़िशा भी एक नक्सल प्रभावित राज्य है. बहुत से लोगों के मुताबिक हो सकता है मिस्त्री के ज़ेहन में अपने निवेश की सुरक्षा को लेकर उहापोह रहा हो. वे निवेश को राजनैतिक उथलपुथल से बचाकर रखना चाह रहे हों. उधर, रतन टाटा असम वाला हादसा दोबारा नहीं होने देना चाहते थे.

टाटा पॉवर-वेलस्पन सौदा

सायरस मिस्त्री और बोर्ड ने समूह की टाटा पॉवर कंपनी को मज़बूती देने के लिहाज़ से जून 2016 में वेलस्पन कंपनी लिमिटेड की वेलस्पन अक्षय ऊर्जा प्राइवेट लिमिटेड डिविज़न को लगभग 9300 करोड़ रुपये में ख़रीदा था. उस वक़्त, अक्षय ऊर्जा के क्षेत्र में यह एशिया की सबसे बड़ी डील थी. रतन टाटा इस बात से नाराज़ हो गए कि टाटा संस को डील करने से बताया नहीं गया. उनका मानना था कि डील काफ़ी बड़ी थी लिहाज़ा टाटा संस की राय ली जानी चाहिए थी.

जानकार बताते हैं कि यह सौदा वह पड़ाव था जहां रतन टाटा और कंपनी में बैठे हुए उनके कुछ विश्वस्तों को महसूस हुआ कि आपसी सलाह लेने के टाटा समूह के रिवाज़ को तिलांजलि दे दी गयी है. यानी, अब टाटा समूह में कुछ नया घटित हो रहा है. टाटा समूह की संस्कृति बदल रही है. बताया जाता है कि रतन टाटा को यह बात टाटा संस की अनदेखी लगी. उन्हें यह गवारा नहीं था.

व्यक्तिगत हितों को तरजीह देने का आरोप

इसे अंग्रेजी में कहते हैं, ‘कनफ्लिक्ट ऑफ़ इंटरेस्ट’ यानी हितों का टकराव. जैसा कि ऊपर जिक्र हुआ, साइरस मिस्त्री के पिता पालूनजी शापूरजी मिस्त्री के पास टाटा संस के लगभग 10 फीसदी के शेयर्स हैं. पालूनजी शापूरजी की कंपनी निर्माण के क्षेत्र में अग्रणी कंपनी है. सायरस पर अपनी पारिवारिक कंपनी को टाटा समूह के दो हज़ार करोड़ रुपये के निर्माण के ठेके देने की बात उठी. हालांकि, सायरस ने अपने हर वक्तव्य में यह बात कही थी कि जब तक वे समूह के कार्यकारी चेयरमैन हैं, तब तक टाटा समूह पालूनजी शापूरजी समूह के साथ कोई व्यापारिक सौदे न करे.

सायरस ने समूह के लिए पंचवर्षीय रणनीतिक प्लान नहीं बनाया था

बताया जाता है कि रतन टाटा ने सायरस से एक प्रेजेंटेशन मांगा था. इसके जरिये वे यह समझाना चाहते थे कैसे 2025 तक टाटा समूह दुनिया के 25 प्रतिष्ठित समूहों में अपनी जगह बनाएगा. साथ ही उन्होंने आने वाले पांच सालों का ख़ाका और एक साल का ऑपरेटिंग प्लान भी मांगा था.

बताते हैं कि सायरस मिस्त्री ने जब ‘विज़न 2025’ पेश किया तो रतन उससे बहुत ज़्यादा प्रभावित नहीं हुए. इसकी वजह यह थी कि उसमें रतन टाटा के कार्यकाल के दौरान किये गए विदेशी अधिग्रहण पर रतन टाटा की राय से अलग राय व्यक्त की गयी थी. सायरस शायद यह बात भूल गए थे कि जब जेआरडी टाटा रतन टाटा को चेयरमैन नियुक्त करने जा रहे थे तो रतन की जिन बातों ने उन्हें सबसे ज़्यादा प्रभावित किया था उनमें से एक था रतन का 1983 में जेआरडी को दिया गया ‘रणनीतिक विज़न.’ इसमें उन्होंने यह समझाया था कि आने वाले 25 सालों में समूह को किन-किन क्षेत्रों में निवेश करना चाहिए और क्या छोड़ना चाहिए.

सायरस की बर्ख़ास्तगी का सबसे कारण बताया गया था कि सायरस के कार्यकाल के दौरान समूह का प्रदर्शन बेहतर नहीं रहा. आइये, देखें कैसा था उनका कार्यकाल.

मिस्त्री का काम

मोटे तौर पर एक बात समझने की यह होती है कि अगर किसी कंपनी की वृद्धि दर स्टॉक मार्केट की दर से ज़्यादा है तो कंपनी औसत से ज़्यादा तेज़ गति से बढ़ रही है. सायरस मिस्त्री के कार्यकाल में समूह का बाज़ार पूंजीकरण लगभग 15 फीसदी बढ़ा, जबकि स्टॉक मार्केट के लिए यह आंकड़ा 10 फीसदी था. दूसरा, टाटा संस का पूंजीकरण भी 26000 करोड़ से बढ़कर 42000 करोड़ रु हो गया था. टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज और टाटा मोटर्स ने जगुआर की वजह से बेहतर परिणाम दिए. टाटा मोटर्स की बिक्री यानी सेल 19,300 करोड़ से बढ़कर लगभग 28,000 करोड़ हो गयी थी. उधर, टाटा स्टील पर मंदी और सस्ते आयात का वैश्विक असर था. उसमें 12 फीसदी की घटत देखी गयी.

सायरस ने अपने बचाव में बोर्ड और अन्य लोगों को जो चिट्ठियां लिखीं उनमें इन बातों का भी ज़िक्र है. संभव है कि रतन को उनके समय पर किये निवेश और अधिग्रहण पर उठती हुई उंगलियां पसंद नहीं आई हों.

अपने इस्तीफ़े में सायरस मिस्त्री ने अपने पर लगे ख़राब परिणामों के दाग़ को साफ़ तरीके से मिटाया ही नहीं है बल्कि, रतन के सबसे प्रिय प्रोजेक्ट नैनो कार और टाटा टेलीसर्विसेज के बढ़ते घाटे पर भी अपनी राय ज़ाहिर की थी. बाद में यह साबित हुआ कि टाटा टेलीसर्विसेज में किये गए निवेश एक ग़लत रणनीति का नतीजा थे.

कभी सीडीएमए में निवेश तो कभी डोकोमो के साथ जीएसएम सेवाएं देना, रतन टाटा के इन फैसलों का जो हश्र हुआ वह इनमें रणनीतिक सोच की कमी को दर्शाता है. ‘न तो ख़ुदा ही मिला, न विसाले सनम, न इधर के रहे, ना उधर के रहे’ वाली बात रही. वहीं, 2जी घोटाला और नीरा राडिया और रतन टाटा की बातचीत पर मचे बवाल भी कम विवादास्पद नहीं थे.

इतने बड़े समूह के चेयरमैन को महज़ पांच साल ही में यह कहकर बाहर का रास्ता दिखा देना कि परिणाम बेहतर नहीं थे, बहुत से लोगों को न्यायसंगत नहीं लगता. उनके मुताबिक यह ध्यान में रखना चाहिए कि सायरस का कार्यकाल समेकन (कंसॉलिडेशन) का था. रतन टाटा के कार्यकाल के आख़िरी दौर में टाटा समूह ने दुनिया भर में कई कंपनियां ख़रीदी थीं, जिनकी वजह से समूह की बैलेंस शीट पर एक दीर्घकालिक असर रहना ही था. इसका ठीकरा सायरस मिस्त्री के सर फोड़ा गया.

यहां पर याद दिलाते चलें कि रतन टाटा ने चेयरमैन बनने के बाद शुरूआती पांच साल समूह में अपनी सिरमौरी कायम करने में गुज़ार दिए थे. यह वही वक्त था जब अंबानी समूह टाटा समूह को टक्कर देने की हिम्मत करने लग गया था.

बहुत से लोग सवाल उठाते हैं कि अगर सायरस मिस्त्री का कार्यकाल ठीक नहीं था तो फिर उनका सालाना पैकेज क्यों बढ़ाया गया? और क्यों जब उन्हें हटाया गया तों स्टॉक मार्केट में टाटा समूह की कंपनियों के शेयर्स टूटे?

तो क्या सायरस ने टाटा समूह के मूल्यों का निर्वहन नहीं किया?

कारोबार की दुनिया को करीब से कवर करने वाले चर्चित पत्रकार देबासीस राय ने अपने एक लेख में सायरस पर यह कहकर तंज मारा है कि वे एक व्यापारी की तरह सोच रहे थे, न कि ‘टाटा’ की तरह. यह बात देबासीस ने टाटा डोकोमो, नैनो और अन्य घाटे के सौदों पर सायरस के नज़रिए की आलोचना में कही है.

यह बात तय है कि टाटा संस बहुत हद तक व्यापार के साथ साथ सामाजिक हितों का भी ध्यान रखता चला आ रहा था. पर 1991 के बाद भारत का व्यापारिक ढ़ांचा बिलकुल बदल गया था. निवेशक ‘दिल मांगे मोर’ के सिद्धांत पर चलते हैं, ज़रा सी चूक किसी कंपनी के लिए बहुत भारी पड़ती है. ऐसे में सामाजिक हित कहीं पीछे रह जाते हैं.

दूसरी बात, कोई भी समूह सामाजिक हित तब तक ही कर पायेगा, जब तक वह मुनाफ़े में है. रिलायंस कम्युनिकेशन का डूबना इस बात पर मुहर लगाता है. कठोर निर्णय लेने ही पड़ते हैं. सायरस न लेते और तथाकथित ‘टाटा मूल्यों’ का संवर्धन करते तो आने वाला समय उन्हें शायद कभी माफ़ नहीं करता और इस बात को भी छोड़िये, निवेशक ही उन्हें माफ़ नहीं करते. आज, रिलायंस कम्युनिकेशन के हादसे के बाद अनिल अंबानी के साथ कौन सा निवेशक खड़ा है जो यह कहे कि उन्होंने इतने लोगों को नौकरी देकर सामाजिक हित का पालन किया था, सो उनका कर्ज़ माफ़ किया जाता है.

चलते-चलते

नौरोजी सकलटवाला पहले ग़ैर टाटा चेयरमैन थे. पद पर रहते हुए ही उनका निधन हो गया. जेआरडी के बाद ग़ैर टाटा परिवार से ताल्लुक रखने वाले रूसी मोदी का चेयरमैन बनना लगभग तय था, लेकिन वे इस कुर्सी पर न बैठ सके. ताजपोशी रतन टाटा की हुई. नया मुखिया चुनने के लिए हुई उस बैठक में सायरस के पिता शापूर जी मिस्त्री ने रतन के नाम का समर्थन किया था.

हाल ही में नियुक्त किये गए सातवें चेयरमैन नटराजन चंद्रशेखरन की पारिवारिक पृष्ठभूमि भी ग़ैर टाटा है. ‘शोले’ में गब्बर ने कालिया पर पिस्तौल तानते हुए क्या कहा था?  साभार : सत्याग्रह