शाह 29 चुनाव लड़ चुके, एक भी नहीं हारे; कार्यकर्ताओं से फोन पर कहते हैं- दोस्त बोल रहा हूं


भाजपा अध्यक्ष अमित शाह मोदी की जीत के प्रमुख रणनीतिकार हैं। 2014 के लोकसभा चुनाव में जहां उन्होंने उत्तरप्रदेश में भाजपा और अपना दल के गठबंधन को 80 में से 73 सीटें दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी, वहीं 2019 के चुनाव में उन्होंने देशभर में भाजपा के सीट बंटवारे, उम्मीदवार चुनने और प्रचार तक की सारी जिम्मेदारियां निभाईं। शाह मोदी के बाद भाजपा का दूसरा सबसे बड़ा चेहरा बनकर उभरे हैं। 1988 में राजनीति में कदम रखने के बाद शाह बहुत तेजी से केवल 30 साल में ही अपनी उपलब्धियों और खूबियों की वजह से पहले गुजरात और फिर देश की राजनीति की सबसे बड़ी शख्सियतों में से एक बन गए हैं। बड़े नेताओं का टिकट काटने, पार्टी और इसके नेताओं को लेकर कड़े फैसले लेने की वजह से शाह की एक कठोर लीडर की छवि भी बनी है।

अध्यक्ष बनने के बाद शाह ने सबसे पहला लक्ष्य लिया- भाजपा की सदस्यता को 10 करोड़ तक ले जाना। उनके इस लक्ष्य का पार्टी और विरोधियों ने माखौल उड़ाया। लेकिन मिस्ड कॉल के जरिए इस अभियान को नई तकनीक से जोड़कर शाह ने भाजपा को दुनिया की सबसे बड़ी राजनैतिक पार्टी बना दिया। अब तक राज्यसभा सांसद रहे अमित शाह ने इस बार गांधीनगर से चुनाव जीतकर लोकसभा में अपनी जगह बना ली है। 2026 में प्रधानमंत्री मोदी की उम्र 75 पार हो जाएगी। अपनी रणनीति की कामयाबी साबित कर  मीडिया और पार्टी के बीच चाणक्य नाम से मशहूर हो रहे अमित शाह अब अपनी क्षमता का लोहा मनवाकर 2026 में स्वाभाविक रूप से मोदी के उत्तराधिकारी के रूप में स्थापित हो सकते हैं।

2014: तकनीक पर जोर, युवाओं को पार्टी से जोड़ा, मोदी रथ से वहां पहुंचे जहां दूसरी पार्टी नहीं गईं

पिछले लोकसभा चुनावों में अमित शाह ने ज्यादा रैलियां नहीं कीं। 2014 के चुनाव में भाजपा के लिए वॉर रूम भले ही प्रशांत किशोर के संस्थान सिटीजन्स फॉर एकाउंटेबल गवर्नेंस ने संभाला लेकिन भाजपा के कंट्रोल रूम में अमित शाह की भी अहम भूमिका रही। जब मोदी देशभर में घूमकर रैलियों पर रैलियां कर रहे थे, तब अमित शाह हर दिन कई-कई घंटे तक देशभर के दर्जन भर युवा कार्यकर्ताओं के साथ कंट्रोल रूम में बैठकर एक-एक सीट के लिए रणनीति तैयार किया करते थे।

सीटों की तीन श्रेणियां : अमित शाह ने सीटों को तीन तरह से बांटा। पहली ऐसी सीटें जो भाजपा का गढ़ थीं। यानी यहां ज्यादा मेहनत की जरूरत नहीं थी। दूसरी ऐसी सीटें जहां कितनी भी मेहनत कर ली जाए, जीतना लगभग नामुमकिन था। तीसरी ऐसी सीटें जो चुनाव में किसी भी तरफ जा सकती थीं। इस तरह शाह ने तय किया कि किस सीट पर कितना समय और मेहनत खर्च करना है।

जमीनी स्तर पर काम: लोकसभा चुनाव में यूपी की जिम्मेदारी मिलने पर उन्होंने गांव-गांव में प्रचारक तैयार किए। उल्लेख एनपी की किताब ‘वार रूम’ के मुताबिक अमित शाह को यूपी की हर लोकसभा सीट के कम से कम 100 स्थानीय नेताओं के नाम याद रहते थे।

मोबाइल मोदी रथ: यूपी में गांव-गांव मोबाइल मोदी रथ चलाने का आइडिया अमित शाह का ही था। शाह ने गांवों में सेटेलाइट टीवी की कमी को देखते  हुए, वैन के माध्यम से उम्मीदवारों के संदेश पहुंचाने का फैसला लिया। ये दूरदराज के गांव थे, जहां बाकी के दल पहुंचना जरूरी नहीं समझते थे।

तकनीक पर जोर: शाह ने भाजपा के लखनऊ ऑफिस में आधुनिक वॉर रूम बनाया था। सोशल मीडिया के माध्यम से युवाओं तक पहुंचने के लिए आईटी सेल बनाई थी। कॉल सेंटर बनाए गए थे, जो भाजपा के कार्यक्रमों की जानकारी देते थे। साथ ही कॉल सेंटर पर फोन करने वालों को भी भाजपा का वॉलंटियर बनने का मौका दिया गया।

1988 से 2013: 17 साल की उम्र में मोदी से पहली मुलाकात, अब 33 साल का साथ

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अमित शाह 22 अक्टूबर 1964 को मुंबई में जन्मे। उनके परिवार से कोई भी सक्रिय राजनीति में नहीं था। पिता पीवीसी पाइप्स का व्यापार करते थे। अमित शाह केवल 14 साल की उम्र मेंे राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ से जुड़ गए। जब वे नरेंद्र मोदी से पहली बार मिले तो उनकी उम्र केवल 17 साल थी। शाह ने मोदी को तभी प्रभावित कर दिया था। 22 साल की उम्र में अमित शाह भाजपा में शामिल हुए, 35 की उम्र में मंत्री बन गए और 50 साल की उम्र में उन्होंने भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष का पद संभाल लिया।

वे भाजपा के अब तक के सबसे युवा अध्यक्ष रहे हैं। अमित शाह ने पहला चुनाव 1988 में प्राइमरी कोऑपरेटिव बॉडी के लिए लड़ा था। तब से अब तक वे तमाम तरह के छोटे-बड़े 29 चुनाव लड़ चुके हैं और आज तक एक भी चुनाव नहीं हारे हैं।  वर्ष 2002 में गुजरात की कैबिनेट में वे सबसे युवा मंत्री बने। विभिन्न पदों पर रहते हुए उन्होंने गुजरात फाइनेंस कॉरपोरेशन और गुजरात रोड ट्रांसपोर्ट को घाटे से बाहर निकाला। गुजरात में उनकी उपलब्धियों और प्रबंधन कौशल को देखते हुए 2014 में तत्कालीन भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने अमित शाह को उत्तर प्रदेश में लोकसभा चुनावों की जिम्मेदारी सौंपी।

2019: कार्यकर्ताओं को महसूस नहीं होने दिया कि भाजपा सत्ता में है, हमेशा जारी रहा प्रशिक्षण
2014 के चुनावों से उलट अमित शाह ने इस बार काफी रैलियां कीं। खुद शाह ने बताया कि उन्होंने 161 जनभाओं को संबोधित करने के लिए डेढ़ लाख किलोमीटर का सफर तय किया। शाह ने देशभर की सीटों के लिए योजना बनाईं। मोदी के सबसे भरोसेमंद होने के बावजूद शाह की जिम्मेदारी सहज नहीं रही, बल्कि बढ़ गई थी। उनके लिए बड़ी चुनौती थी, वह भी उस वक्त जब हाल ही में तीन राज्यों की सत्ता हाथ से गंवानी पड़ी थी। शाह ने 2019 की योजनाओं पर गुजरात विधानसभा चुनाव से पहले ही काम शुरु कर दिया था।

पुलवामा से बदली रणनीति: शाह ने 2019 के लिए पूरी तरह से मोदी के विकास एजेंडे को आगे बढ़ाने की रणनीति बनाई थी, लेकिन उन्हें झटका लगा जब 14 फरवरी को पुलवामा कांड हुआ। तीन दिन तक शाह किसी से नहीं मिले। वे अपनी रणनीति को लेकर असमंजस में थे। बालाकोट के बाद 26 फरवरी को शाह फिर पुराने रूप में लौटे।

सिर्फ मोदी पर केंद्रित प्रचार: शाह ने पूरे अभियान को गांवों तक पहुंचाया जबकि विपक्षी दलों का प्रचार शहरी-अर्ध शहरी क्षेत्रों तक ही था। उन्होंने निर्देश दिया कि अभियान में किसी पोस्टर-होर्डिंग्स में उनकी तस्वीर नहीं लगाई जाए।
हर रोज 524 किमी का सफर: शाह ने 2.47 करोड़ सदस्यों वाली पार्टी को 11 करोड़ तक पहुंचाया तो पहली बार 11 लाख सक्रिय कार्यकर्ताओं को प्रशिक्षित किया गया। शाह के राजनैतिक यात्रा का औसत 524 किमी/दिन का है।
भाजपा दफ्तरों की पहुंच बढ़ाई: शाह ने देश के हर जिलों में अपनी स्वामित्व वाली जमीन पर दफ्तर होने का अभियान छेड़ा। आज 78 फीसदी जगहों पर पार्टी का अपना दफ्तर है।

प्रचार के तीन बिंदु तय किए: सबसे पहले उम्मीदवारों की प्रासंगिकता खत्म कर स्थानीय स्तर की सत्ता विरोधी लहर को कमजोर करना। दूसरी- वोटरों के दिमाग पर छा जाने के लिए प्रचार की ‘टाइमिंग’ वाली रणनीति ताकि वोटरों को ज्यादा समय ना मिले। तीसरी- प्रचार में चुनावी मुद्दा सिर्फ मोदी और राष्ट्रवाद को बनाना। मोदी ने इसी रणनीति के तहत रैलियों में उम्मीदवारों का नाम न लेकर कमल का बटन दबाने की अपील की।

कार्यशैली: जमीनी काम पसंद, खर्चे तक पर नजर : अमित शाह की छवि एक तरफ एक कठोर नेता की है, तो दूसरी तरफ उन्हें जमीन से जुड़ा हुआ भी माना जाता है।

उनके प्रबंधन कौशल और कार्यशैली के कुछ उदाहरण –

जोखिम उठाते हैं : 2014 के लोकसभा चुनावों में जीत हासिल करने और अध्यक्ष बनने के कुछ ही महीनों बाद उन्होंने शिवसेना से 25 साल से चला आ रहा गठबंधन खत्म करने की घोषणा कर दी। उनके इस फैसले से प्रधानमंत्री मोदी तक को चौंका दिया। लेकिन उन्होंने भाजपा पर शिवसेना के दबाव को कम करने लिए ऐसा करना जरूरी समझा।

स्थानीय नेताओं का ख्याल: उल्लेख एनपी की किताब ‘वॉर’ में बताया गया है कि वे लगातार स्थानीय नेताओं से बात करते हैं। खुद भी फोन लगाते रहते हैं और बात की शुरुआत ‘दोस्त बोल रहा हूं’ से करते हैं। कार्यकर्ताओं से जुड़ाव: अमित शाह अपनी यात्राओं के दौरान बहुत कम ही किसी होटल में रुकते हैं। वे किसी कार्यकर्ता या फिर सर्किट हाउस में रुकना पसंद करते हैं। उनका मानना है कि इससे कार्यकर्ताओं के करीब रहकर उनके मन की बात जान  सकते हैं।

खर्चे पर लगाम : शाह छोटे-छोटे खर्चों पर भी नजर रखते हैं। ‘वॉर रूम’ किताब में एक किस्सा है। 2014 में पार्टी की एक बुकलेट छपवाई जा रही थी। तब शाह के एक सहयोगी का प्रिंटर ढाई रुपए ले रहा था। लेकिन शाह के कहने पर उनके करीबी सुनील बंसल ने डेढ़ रुपए प्रति बुकलेट की दर से बुकलेट छपवाईं। इसी तरह शाह चुनाव प्रचार को छोड़कर आमतौर पर चार्टेड प्लेन्स का इस्तेमाल नहीं करते हैं।

पार्टी का कायापलट : अमित शाह पार्टी के काम करने के तरीकों में बहुत बदलाव लाए। उन्होंने कार्यकर्ताओं की बात पार्टी तक पहुंचाने के लिए सिस्टम तैयार करवाया ताकि दिल्ली में कम कार्यकर्ता जुटें। पहले चुनाव खर्च का पैसा थर्ड पार्टी के माध्यम से जाता था। 2014 से शाह ने सीधे एकाउंट में पैसा भेजने की शुरुआत की।

24 घंटे, 365 दिन काम : शाह का मानना है कि संगठन को हमेशा 24 घंटे 365 दिन गतिशील रखना चाहिए। यह काम वे 1982-83 से वार्ड के बूथ प्रभारी के तौर से करते रहे हैं।