हंस हंस गला मिलो प्रेम सूं.. क्यों बांधों हो बैर….



बीकानेर। स्वास्थ्य एवं साहित्य श्रृंखला संगम कवि की 144 वीं कड़ी को (रामनवमी) यादगार बनाने हेतु श्री किशननाथ जी खरपतवार की अध्यक्षता में श्री जब्बार बीकाणवी के मूख्य अतिथि तथा विशिष्ट अतिथि हाफिज अली, संस्था के संरक्षक कवि नेमचंद गहलोत ने मंच को शोभायमान किया, मंच के सानिन्ध्य में काव्य गोस्ठी का शुभारम्भ किया सरस्वती वन्दना के साथ नरेश खत्री ने- हे स्वर की देवी मां वाणी में मधुरता दो, फिर कविता सुनाई मुझे मेरा बचपन फिर से लोटा दो। वली मोहम्मद गौरी- ‘‘कोन हंस कर जला गया दिल को…, एक तमाशा बना दिल का।
पुखराज सोलंकी ने काव्य प्रेम उद्गार व्यक्त करते हुए रचना सुनाई- कोई न हो जब पास मेरे, तो कोई न कोई पास मेरे होता है। माजिद खान गौरी ने- जिन्दगी भी यहां कोई किम्मत नहीं रही, जो जिन्दा है उनकी कोई जरूरत नहीं रही।
राजस्थानी भाषा साहित्य एवं संस्कृति अकादमी के पूर्व कार्य उपसचिव डॉ. तुुलसीराम मोदी ने- ‘‘जीवण रा पाना कई और जोड़ दे’’। इनसान को व्यवहार कुशल बनाने सन्दर्भ की थी।
ओमप्रकाश भाटी- आत्मीय जीवनोपयोगी आत्मीय सन्देश सुनाए।
सिराजु दिन भुटो- ‘‘कहां है वो हिन्दुस्तान’’ सुनाकर पूरे कवि सदन की दाद बटोरी।
केलाश टाक- ‘‘वक्त-बेवक्त मन को बहलाता हूं, किताबों की तरह आदमी का चेहरा पढ़ता हूं’’।
बी एल नवीन- जाने वो कैसे लोग थे जिनकों प्यार से ……, गीत सुनाकर संगीत मय रोमांचित माहोल बना दिया।
कवि नेमीचंद गहलोत- चुटकिले अन्दाज में पेट पकड हास्य विनोद किया फिर ‘‘आना जाना तो लगा ही रहेगा’’ रचना सुनाई।
फिर रामनवमी पर विशेष हाफिज उस्मान (विशष्ट अतिथि) ने अपने सन्देश में बताया कुछ लोग वन्देमातरम से क्यों परहेज करते है, कुरान में लिखा है मुल्क से मूहब्बत करो।
फिर ‘‘किस रावण की टांगंे तोडु… किस लंका में आग लगाउं… घर घर रावण है… घर घर लंका… राम कहां से लाउं’’ सुनाई।
कासिम बीकानेरी ने गत शहिद दिवस पर सामयिक रचना प्रस्तुत ‘‘कब तब होगे हम शहीद…., अब तो हमें संभलना चाहिए… गुलामकारों को छोड़कर पहले खुद को बदलना चाहिए’’।
कवि चोपाल में बुनियादि स्तम्भ रहे निर्लिप्त… निश्छल रहे सेवाधारी श्री किशननाथ का सम्मान किया कवि चोपाल के उपस्थित कवि रचनाकारों ने करतल ध्वनि से व मंच से शॉल माल्यार्पण द्वारा आत्मीय सम्मान किया, फिर सम्मान्नित होने वाली प्रतिभा ‘‘नाथजी’’ ने हंस हसं गला करो प्रेम सूं…, क्यों बांटो हो बैर…, प्रेम बसे हैकाया रे माई… रचना सुनाई। जबार बीकाणवी ने रचनाकारों की काव्य कृतियों पर नाज किया कि आत्मीय साधना बताया।
काव्य गोष्ठी का सुव्यवस्ािित शेर शायरी दोहे के वाक चातुर्य के हाजी कैलाश टाक ने किया अन्त में रामेश्वर द्वारकादास बाड़मेरा ‘‘साधक’’ ने शहीदों का नमन करते हुए संस्कृत में कविता सुनाई- ‘‘राष्ट्र हेतोर्भवेन मरण. प्राण त्राण च राष्ट्राय’’ तथा आभार धन्यवाद व्यक्त करते अपेक्षा व्यक्त आगामी काव्य गोष्ठी मधुर मुस्कान लिए नई रचना के साथ शुभागमन की अपेक्षा की।