ये रत्न रंक को राजा और राजा को रंक बनाने की अद्भुत क्षमता से ओतप्रोत है



नीलम एक ऐसा कीमती रत्न (पत्थर) है जो रंक को राजा और राजा को रंक बनाने की अद्भुत क्षमता से ओतप्रोत है। यह रत्न आपदाओं के लगातार प्रहार से तार-तार हुए लोगों की जिंदगी में नई रोशनी लाकर उनकी तमाम विपत्तियों व असफलताओं को सुख-समृद्धि एवं सफलता में बदल देता है।

रत्न शास्त्रों के अनुसार नीलम धारण करने वालों के शरीर की सुरक्षा आसमान के देवी-देवता एवं फरिश्ते भी करते हैं। माणिक एवं हीरे रत्नों के राजा कहलाते हैं। उनके बाद यदि कोई दूसरा रत्नों का उप-राजा कहलाने का अधिकारी है तो वह नीलम ही है।

नीलम को संस्कृत में इन्द्रजीत मणि, फारसी में नीलाबिल, याकूत और अंग्रेजी में सेफायर दुरग्यूज के नाम से जाना जाता है। हिन्दू और मुस्लिम दोनों के ही धर्मग्रन्थों में इस रत्न की महिमा का गुणगान किया गया है। यूनानी लोग नीलम को अपने देवी-देवताओं को भेंट चढ़ाया करते थे।

यह रत्न महानदी, हिमालय, जम्मू-कश्मीर, श्रीलंका, थाईलैंड, बर्मा, बैंकाक, आस्टे्रलिया, रोडेशिया, मोनटाना, जावा और ब्रह्मपुत्र में पाया जाता है। चिकना, चमकदार, साफ रंग वाला नीलम उत्तम माना जाता है। दूध के बीच असली नीलम रख़ने से दूध का रंग नीला दिखाई देने लगता है।

शनिवार के दिन मध्यान्ह काल में नीलम को दूध युक्त जल से धोकर चन्दन, अक्षत आदि से पूजा करके धारण करने पर शनि की साढ़ेसाती का प्रभाव दूर होता है। अगर इसके धारण करने पर बुरा स्वप्न आता हो या किसी भी प्रकार की अप्रिय घटना घट जाए तो इसे धारण नहीं करना चाहिए। अगर पहनने पर शुभ सिद्ध हो तो यह अपार सम्पत्ति दिलाने वाला होता है। रोग, दोष, दु:ख, दरिद्रता आदि नष्ट होकर धन-धान्य, सुख-सम्पत्ति, बल-बुद्धि, यश-आयु एवं कुल सन्तान की वृद्धि होती है। नष्ट हुआ धन वापस मिलता है तथा मुख की आकृति एवं नेत्र-ज्योति की वृद्धि होती है।

4.08 या 10 रत्ती का नीलम चांदी की अंगूठी में मढ़वाकर शनिवार के दिन दाहिने हाथ की उंगली में धारण करना चाहिए। नीलम धारण करने से पूर्व अच्छे जानकार से उसके विषय में जानकारी प्राप्त कर लेनी चाहिए। नीलम में 8 प्रकार के दोष पाए जाते हैं-