जो संपन्न हैं, उन्हें गरीबों के बेहतर जीवन के लिए कुछ न कुछ करना चाहिए: अजीम प्रेमजी


देश के दूसरे सबसे अमीर  74 साल के अजीम प्रेमजी सबसे प्रतिष्ठित भारतीय दानी हैं। विप्रो के चेयरमैन और मैनेजिंग डायरेक्टर प्रेमजी अपनी कुल डेढ़ लाख करोड़ रु. की संपत्ति में से आधी समाज सेवा के लिए दान करना चाहते हैं। इनमें से 65 हजार करोड़ रु. दान भी कर चुके हैं। वे हर साल 500 करोड़ रु. दान करते हैं। खास बात यह है कि प्रेमजी इकोनॉमी क्लास में इवाई यात्रा करते हैं और अपनी मारुति 1,000 से चलते हैं। प्रेमजी 30 जुलाई को रिटायर हो रहे हैं। 31 जुलाई को उनके बेटे रिशद कंपनी की कमान संभालेंगे। पढ़िए अजीम प्रेमजी से बातचीत के अंश…

सवाल- व्यापार और उद्योग की समझ आपको पिता से मिली। समाजसेवा का भाव कैसे जागा?
जवाब- मुझे यह गुण मां से मिला। वह डॉक्टर थीं, पर उन्होंने कभी इसे पेशा नहीं बनाया। विवाह के बाद ही उन्होंने हाजी अली में बच्चों के लिए हड्डियों का अस्पताल खोल दिया। 27 की उम्र से 77 की उम्र तक जीवन गरीब बच्चों को समर्पित कर दिया। तब हमारे पास ज्यादा पैसे नहीं थे। पैसों के इंतजाम के लिए मां को काफी मेहनत करनी पड़ी। सरकार से मदद मांगना, फिर फंड घोषित होने के बाद उसे जारी कराने के लिए मशक्कत करना, सारा समय इसी में निकल जाता था। सरकारें फंड देने का वादा तो करती हैं, लेकिन जारी करने में आनाकानी करती हैं। मां रोज नौ घंटे काम करती थीं। वो भी तब, जब घर पर चार बच्चे थे। लेकिन, अब समय बदल चुका है। लोगों को लगता है कि पत्नी और बेटे-बेटियों को ही उनका सारा पैसा मिलना चाहिए।

सवाल- तो आप कैसे अलग हैं?
जवाब- अमीरी ने मुझे कभी रोमांचित नहीं किया। मैं मानता हूं कि जो संपन्न हैं, उन्हें उन गरीब-कमजोर लोगों के लिए कुछ ऐसा करना चाहिए, जिससे उनका जीवन भी बेहतर हो।

सवाल- सीएसआर के तहत 2% दान देना हाेता है, क्या यह मददगार साबित नहीं हो रहा?
जवाब- बहुत से लोग कंपनी का सीएसआर फंड अपनी ही फाउंडेशन में खर्च कर देते हैं। इस पर रोक लगनी चाहिए। विप्रो में हम सीएसआर फंड के 400 करोड़ रुपयों में से एक भी पैसा अपनी फाउंडेशन को नहीं देते।

सवाल- विप्रो में आपकी व्यक्तिगत हिस्सेदारी इतनी ज्यादा क्यों है? शायद यह 78% है।
जवाब- पिता के इंतकाल के वक्त यह 50% थी। डिविडेंट के तौर पर मिलने वाला हरेक पैसा मैंने विप्रो के शेयर खरीदने में लगाया। लोगों ने कहा कि मैं मूर्ख हूं, पर विप्रो पर मुझे ही भरोसा नहीं होगा तो फिर किसे होगा। इस तरह मेरी हिस्सेदारी 78% तक पहुंच गई।

सवाल- क्या आपको कुछ बदलाव होता नजर आया?
जवाब- नए बिजनेसमैन नई सोच रखते हैं। मैंने महसूस किया है 35-40 साल के आंत्रप्रेन्योर बड़े दिल से जनकल्याण को देखते हैं। मुझे विश्वास है भविष्य में ये लोग समाजसेवा के लिए फंडिंग का बड़ा जरिया बनेंगे।

सवाल- आप शुरू में वनस्पति तेल का कारोबार करते थे। अचानक आईटी सेक्टर में कैसे आ गए?
जवाब- 70 के दशक में उद्योग मंत्री जॉर्ज फर्नांडिस चाहते थे कि देश में नई टेक्नोलॉजी आए, लेकिन वे (आईबीएम) भारत पर ऐसी टेक्नोलॉजी थोप रहे थे, जो अमेरिका में 7-8 साल पहले खत्म हो चुकी थी। फर्नांडिस ने उनसे कहा कि नई टेक्नोलॉजी लाएं। आईबीएम ने इनकार किया तो फर्नांडिस ने शेयर होल्डिंग कम करवा दी और आईबीएम भारत से चली गई। तब आईबीएम के पास 80% मार्केट शेयर था। उसके जाते ही वैक्यूम हो गया। हम तभी इस क्षेत्र में उतरे। फिर पलटकर देखने की जरूरत नहीं पड़ी।

सवाल- लेकिन, आप आईटी में तो निपुण थे नहीं?
जवाब- हमने निपुणता को एकत्रित किया। सीधे कैंपस से नए लोग चुने। इसरो और डिफेंस रिसर्च जैसे संस्थानों से भी नियुक्तियां कीं। टीम का लीडर हमने ऐसे व्यक्ति को बनाया, जो आईटी का नहीं था। लेकिन, बिजनेसमैन बहुत अच्छा था। बाकी कंपनियों को टेक्नीशियन चला रहे थे और हम टेक्नोलॉजी का बड़ा बिजनेस खड़ा कर रहे थे।

सवाल- वॉरेन बफे और बिल गेट्स द्वारा शुरू की गई ‘गिविंग प्लेज’ में आप तीसरे भारतीय हैं। इसमें भारतीय इतने कम क्यों हैं?

जवाब- भारतीय मानसिकता में परिवार प्रमुख है। मैं छह साल से अच्छी पहल में हिस्सेदारी कर रहा हूं। हर साल हम ऐसे संपन्न लोगों को आमंत्रित करते हैं, जो दान करना चाहते हैं। इसका एक सचिवालय है, जिसका खर्च मैं खुद उठाता हूं। हम किसी पर दबाव नहीं डालते, न ही दान देने वाले को बाध्य करते हैं कि वे इसे सार्वजनिक करे। हमें कुछ सफलता मिली है, लेकिन रास्ता अभी बहुत लंबा है।

सवाल- आपके पास इलेक्ट्रिकल इंजीनियर में स्टेनफर्ड यूनिवर्सिटी से डिग्री है, लेकिन आपकी पढ़ाई आपके पिता के निधन की वजह से बाधित हो गई थी।
जवाब- मैं 21 साल का था, जब स्टेनफर्ड यूनिवर्सिटी से अगस्त 1966 में विप्रो संभालने के लिए वापस बुला लिया गया था। मैंने एक समर स्कूल पूरा कर लिया था, लेकिन 8 या 10 यूनिट्स बाकी थीं, जो मैंने 20 साल बाद पत्राचार से पूरी की।

सवाल- क्या तब आईटी पर कोई कोर्स नहीं था?
जवाब- इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग उस वक्त आईटी के करीब था। इनफॉर्मेशन टेक्नालॉजी के लिए अलग से कोई कोर्स नहीं था। मुझे याद है एक बार एफसी कोहली ने मुझे बताया कि कैसे जेआरडी टाटा ने उन्हें टीसीएस का पहला हेड बनाने की बात कही। तब कोहली ने जेआरडी से कहा था, लेकिन मुझे तो कंप्यूटर के बारे में कुछ भी नहीं पता। जेआरडी का जवाब था कंप्यूटर के बारे में तो कोई कुछ नहीं जानता। तुम्हारे पास तो इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग में डिग्री है।

सवाल- अमेरिका से लौटकर क्या आपने उन चीजों को बढ़ाने पर ध्यान दिया, जिसे पिता ने शुरू किया था?
जवाब- हम प्राथमिक तौर पर कमोडिटीज और वनस्पति क्षेत्र में थे, जिसे हम होलसेल मार्केट में बेचा करते थे। हमने काम को आगे बढ़ाते हुए एक ब्रांड के तौर पर रीटेल करना शुरू किया और एक डिस्ट्रीब्यूशन नेटवर्क बनाया। इसके बाद हम साबुन के व्यापार में बढ़े। इस दौरान जो एक बुद्धिमानी का काम हमने किया वो मैन्युफैक्चरिंग प्लांट की मशीनरी में निवेश करना था। शुरुआत में इससे दिक्कतें बहुत हुईं। हमारा जो पहला प्रोडक्ट था, उसका लॉन्च फेल हो गया। पर हमारे इन्वेस्टमेंट के कारण हमने संंतूर को दोबारा लॉन्च किया, जो काफी सफल रहा। इसके बाद हम टॉयलेटरीज (बाथरूम में उपयोग होने वाले सामान) के क्षेत्र में आगे बढ़े।

सवाल- इन सबमें स्टैनफर्ड ने कैसे मदद की?
जवाब- इंजीनियरिंग असल में मूल्यांकन करने में मदद करती है। यूनिवर्सिटी में कोर्स सिलेक्शन में बहुत छूट थी। मैंने लिबरल आर्ट्स में बहुत सारे विषय चुने, जैसे- पश्चिमी सभ्यता का इतिहास, अंग्रेजी भाषा और शेक्सपियर पर एक एडवान्स्ड कोर्स। यह सब भारत में संभव नहीं था। क्योंकि यहां इंजीनियरिंग के अलावा कुछ और पढ़ने की छूट नहीं थी। स्टैनफर्ड की पढ़ाई ने दिमाग खोल दिया। वहां मैंने टेनिस खूब खेला और एक ईटिंग क्लब ज्वाइन किया। ईटिंग क्लब में आप कैफेटेरिया में नहीं खाते, आप साथ मिलकर खाते हैं और क्लब के कार्यक्रमों का आनंद लेते हैं। मैंने बहुत अच्छे-अच्छे दोस्त भी बनाए।

सवाल- आपके हिसाब से विप्रो का भविष्य किधर है?
जवाब- मुख्य रूप से आईटी में। भौगोलिक स्तर पर हम बड़ी तेजी से डायवर्सिफाय कर रहे हैं। अब हम लैटिन अमेरिका और अफ्रीका में भी प्रवेश कर चुके हैं। काफी ताकत यूरोप में भी लगा रहे हैंै। हम देख सकते हैं कि अंतरराष्ट्रीय बाजार की तुलना में भारत का आईटी सेक्टर तेजी से बढ़ेगा और एक सम्मानजनक स्थिति में पहुंचेगा।

सवाल- आप अपनी आधी कमाई दान देना चाहते हैं?

जवाब- आज की स्थिति में करीब 40% तो पहले से ही अजीम प्रेमजी फाउंडेशन की मिल्कियत है। यह बड़ी रकम है। 10 अरब डॉलर रुपए में करीब 65 से 70 हजार करोड़ होते हैं। यह टाटा ग्रुप के बाद दूसरा सबसे बड़ा दान है। वहीं, हमारा सालाना अनुदान टाटा के बराबर ही है।