हम जीत ही रहे हैं… इस खुशफहमी में हारे कांग्रेस के बड़े चेहरे


लोकसभा चुनावों में कांग्रेस प्रदेश की सभी 25 संसदीय सीटों पर बुरी तरह से हारी। इनमें से पांच सीटें तो ऐसी हैं, जिन्हें कांग्रेस जीता हुआ मानकर चल रही थी। ये सीटें हैं, जोधपुर, बाड़मेर, अलवर, टोंक-सवाईमाधोपुर और नागौर। वजह थी यहां कांग्रेस के बड़े चेहरे।

प्रत्याशियों के अतिआत्मविश्वास और हम जीत ही रहे हैं कि खुशफहमी ने सारे समीकरण बिगाड़ दिए। आपसी फूट से बूथ मैनेजमेंट तो गड़बड़ा ही गया, कांग्रेस को कैडर वोट भी नहीं मिल पाया, जिसे वह तय मानकर चल रही थी। दिलचस्प यह भी है कि इन सीटों पर पार्टी का अंदरूनी सर्वे भी इन्हें जीता हुआ मानकर ही चल रहा था। मोदी लहर का अंडर करंट भी पार्टी समझ नहीं पाई।

कई ऐसे बड़े चेहरे शामिल हैं जिनके जीत के दावे परिणामों से पहले किए जा रहे थे। कांग्रेस जिन सीटों को मजबूत मानकर चल रही थी, ये इन्हीं बड़े चेहरों वाली सीटें थी। इन चेहरों में जोधपुर से सीएम गहलाेत के बेटे वैभव, बाड़मेर से मानवेंद्र सिंह, नागौर से ज्योति मिर्धा, अलवर से भंवर जितेंद्र सिंह और टोंक-सवाई माधोपुर से नमोनारायण मीणा के नाम शामिल हैं। इन प्रत्याशियों के हार के पीछे मोदी फैक्टर के अलावा दूसरी बड़ी वजह कांग्रेस में टीम वर्क का नहीं होना रहा।

ग्राउंड लेवल पर भाजपा के मुकाबले कांग्रेस का संगठन बहुत कमजोर रहा। विधानसभा चुनावों में कांग्रेस को भाजपा सरकार की एंटी इनकमबेंसी का वोट चला गया, लेकिन लोकसभा चुनावों में कांग्रेस अपने वोटरों को मोटिवेट ही नहीं कर पाई। इसके अलावा एक बड़ा कारण यह रहा कि कांग्रेस अपने मजबूत क्षेत्रों से बड़ी लीड नहीं ले पाई, जबकि जिन सीटों पर भाजपा का प्रभाव था वहां से मिली लीड ने ही चुनाव का नक्शा बदल दिया।

वैभव : अतिविश्वास और जातीय समीकरण पक्ष में नहीं रहे
5 माह पहले विधानसभा चुनाव में जोधपुर में आठ में से सात सीटें जीतने वाली कांग्रेस अति आत्मविश्वास की वजह से हार गई। पोकरण में भाजपा को एससी वोट ले गई, वहीं जाट व विश्नोई बाहुल्य लूनी सीट पर भाजपा को 67 हजार से ज्यादा की लीड मिली। वैभव अपने पिता गहलोत के क्षेत्र में तो हारे ही अपने बूथ पर भी बढ़त नहीं बना सके।

मानवेंद्र : कांग्रेस का कोर वोटर घरों से नहीं निकला
कांग्रेस काे विधानसभा में बाड़मेर से छह सीटें मिली थी। बंपर वोटिंग के बावजूद कांग्रेस का कोर वोटर घरों से नहीं निकला। राजपूत, एससी और मुस्लिम बहुल जैसलमेर, शिव से मानवेंद्र काे केवल 33 हजार की लीड मिली। वहीं जाट और विश्नोई बाहुल्य सीट बायतू और गुड़ामलानी सीट पर कैलाश को 1.50 लाख से अधिक वोट मिले।

ज्योति मिर्धा : भाजपा-आरएलपी के वोट कांग्रेस पर भारी पड़े
नागौर में कांग्रेस प्रत्याशी ज्योति मिर्धा की हार के पीछे भाजपा का गठबंधन बड़ी वजह रहा। यहां भाजपा और आरएलपी के वोट एक होने से कांग्रेस कमजोर हो गई। गठबंधन की वजह से रालोपा के प्रत्याशी हनुमान बेनीवाल को फायदा हुआ। भाजपा से समर्थन मिलने के चलते जाटों के साथ मूल ओबीसी वोट भी उनके पास आ गया। बेनीवाल का खुद का आधार और भाजपा संगठन की सक्रियता यहां कांग्रेस पर भारी पड़ी।

भंवर जितेंद्र : कांग्रेस की फूूट हार का कारण बनी
अलवर में कांग्रेस प्रत्याशी भंवर जितेंद्र की हार के दो बड़े कारण रहे। यादव दबदबे वाली बहरोड़ और मुंडावर विधानसभा सीटों से बाबा बालकनाथ को करीब 2 लाख से ज्यादा की लीड मिली। कांग्रेस संगठन में फूट भी कारण रहा। उपचुनावों में जीतने वाले डॉ. करण सिंह का पार्टी ने टिकट काट दिया था। इससे यादव लामबंद हुए। काट कर भंवर को चुनाव लड़वाया। इससे यादव पूरी तरह बालकनाथ के पक्ष में लामबद्ध हाे गए।

नामोनाराण मीणा : जातियों की लहर भाजपा के पक्ष में चली
टोंक-सवाई माधोपुर सीट से नमोनारायण मीणा के सामने भाजपा ने गुर्जर प्रत्याशी सुखबीर सिंह जौनपुरिया को उतारा। इसलिए चुनाव दो जातियों में बंटा। जाट पट्‌टी कहलाने वाली मालपुरा और निवाई विधानसभा सीटों से जौनपुरिया ने 90 हजार से ज्यादा की लीड ली। यही दो सीटें ही लोकसभा चुनावों में नमोनारायण के हार की वजह बनी। 5 माह पहले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने यहां आठ में से छह सीटें जीती थी। कांग्रेस यहां खुद को मजबूत मानकर चल रही थी। इसकी वजह से संगठन सक्रिय नहीं हुआ और मिस मैनेजमेंट के कारण नमाेनारायण जीती हुई बाजी हार गए।