शुक्रवार, 8 मई 2026
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अमूल्य पांडुलिपियों को सहेजने में अव्वल राजस्थान, अब तक 15 लाख का सर्वे; बीकानेर में सबसे ज्यादा 3.4 लाख, PM मोदी ने की तारीफ

May 07, 2026 Super Admin 6
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अमूल्य पांडुलिपियों को सहेजने में अव्वल राजस्थान, अब तक 15 लाख का सर्वे; बीकानेर में सबसे ज्यादा 3.4 लाख, PM मोदी ने की तारीफ

भारत सरकार ने इस वर्ष प्राचीन पांडुलिपियों को सहेजने का एक अभियान शुरू किया है. ‘ज्ञान भारतम मिशन' नाम के इस अभियान की शुरुआत 16 मार्च को की गई थी जो तीन महीने तक चलेगा. इसका उद्देश्य देश भर में स्थित पांडुलिपियों की पहचान करना और दस्तावेजों के तौर पर उनका रिकॉर्ड तैयार करना है, ताकि भारत की प्राचीन ज्ञान परंपरा को सुरक्षित और संरक्षित किया जा सके. अभियान के तहत पांडुलिपियों के संरक्षण और सर्वे का कार्य तेज गति से जारी है. बताया जा रहा है कि इसमें राजस्थान में सबसे अधिक पांडुलिपियों का सर्वे किया जा चुका है. प्रदेश में भी सबसे अधिक काम बीकानेर में हुआ है.

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तीन महीने तक चलेगा ‘ज्ञान भारतम मिशन' का सर्वे

देश भर में ‘ज्ञान भारतम मिशन' अभियान के तहत 16 जून तक सर्वे कार्य जारी रहेगा. प्रदेशों में राजस्थान में अब तक 15 लाख से अधिक पांडुलिपियों का सर्वे किया जा चुका है जो देश में सबसे अधिक माना जा रहा है. वहीं बीकानेर जिला भी इस मिशन में अहम भूमिका निभा रहा है जहां अब तक करीब 3 लाख 40 हजार पांडुलिपियों का सर्वे पूरा हो चुका है.

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बीकानेर में तेजी से हो रहा काम

बीकानेर की खास बात यह है कि यहां स्थित अभय जैन ग्रंथालय में ही करीब 2 लाख पांडुलिपियां संरक्षित हैं जो अपने आप में एक बड़ी धरोहर मानी जाती हैं. इन पांडुलिपियों में इतिहास, संस्कृति, धर्म और परंपरा से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारियां संजोई गई हैं. खास बात यह भी है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पिछले महीने अपने ‘मन की बात' कार्यक्रम में बीकानेर की इन पांडुलिपियों के संरक्षण के लिए हो रहे कार्य का उल्लेख किया था जिससे इस अभियान को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिली.

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बीकानेर की जिला नोडल अधिकारी डॉ. नितिन गोयल ने जानकारी देते हुए बताया कि यह अभियान पूरी तरह लक्ष्य आधारित है और इसके तहत घर-घर जाकर और विभिन्न संस्थानों में पहुंचकर पांडुलिपियों का सर्वे, सत्यापन और दस्तावेजीकरण किया जा रहा है. उन्होंने बताया कि इस मिशन का उद्देश्य न केवल इन अमूल्य धरोहरों को सुरक्षित रखना है बल्कि आधुनिक तकनीक के माध्यम से इनका डिजिटलीकरण कर इन्हें डिजिटल प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध कराना भी है ताकि आने वाली पीढ़ियां भारतीय ज्ञान परंपरा से जुड़ सकें.

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